गुदगुदी

" ‘आटे बाटे चने चबा के,कोकलिया के कान कटा के’ , कोमल सी हथेली पुचकारते हुए 'ये बिल्ली का चौका' ,बच्चे का अंगूठा हिलाकर 'ये गैया का खूँटा' , बड़ी से छोटी उंगलिया पकड़ते हुए " ये अम्मा की, ये बाबा की, ये पापा की , ये मम्मी की , ये मेरी ,नोनू की बछिया खो गई ..खो गई .... खो गई ......, (फिर उंगलिया नाज़ुक सी कलाई से ऊपर धीरे धीरे बगल की तरफ जाती), पा गई... पा गई... पा गई .. और फिर एक बड़ी ही निश्छल ठहाकेदार हँसी पूरे घर को अपनी मासूमियत से महका देती है । मैं जब भी अपने घर जाता तो मेरी भतीजी मेरे पास आकर कहती ' चाचा , आटे बाटे करो ना " और मैं हर बार उसकी इस बचकानी चाहत को पूरा कर देता। गुदगुदाते हुए उसके चेहरे से आँखे कही गायब सी हो जाती और दांत चेहरे को सुसज्जित करने लगते है I हँसी होती ही इतनी प्यारी है, शहद सी मीठी ये हँसी ज्यादातर लोगो को उनके बचपन की याद दिला देती है । बचपन में किसी न किसी तरीके से बड़ो ने हमारे गुदगुदी की है , चाहे वो रूठे हुए चेहरे पे मुस्कराहट लाने के लिए हो या सिर्फ बस हमारा खिलखिलाता हुआ वो ललाट देखने के लिए जो भगवान के समान मनोहित है ।

CSA

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मेरी गुदगुदी की यादें कुछ अलग है । बचपन में गर्मिओ की छुटियाँ मैं ज्यादातार माँ के साथ शहर से दूर ग्रामीण परिवेश में मनाया करता था हम सब बच्चे खेतों में घूमते , गन्ने छील के खाते, गाय का ताज़ा-ताज़ा दूध पीते और रात को तारों की चादर के नीचे सो जाते । एक बच्चे के लिए शायद ही ये किसी स्वर्ग से कम हो,आपको हर उस चीज़ का अनुभव मिलता है जो या तो आपने किताबो में देखी हो या अपने परिवार के सदस्यों से सुनी हो । मेरे लिए भी कुछ ऐसा ही था ये अनुभव,एक दम अदभुत।

बात उस समय की है जब मैं ६(6) वर्ष का था और हर बार की तरह मैं गर्मिओ की छुटियों में माँ के साथ अपने रिश्तेदारो के यहाँ गया था ।शुरुआत के दिन हर बार की तरह अदभुत थे , मैं अपने भाई बहनों के साथ दिनभर खेलता ही रहता था I माँ खूभ फटकार लगातीं और मैं हर बार ये कहता "खेलने दो ना , घर में भी दीदी-भैया नहीं खेलते मेरे साथ "।

उस दिन जब दोपहर में सब सो गए तो मेरे १३(13) वर्षिय भाई मुझे अपने साथ बगल के एक घेर पे ले गए एक नया खेल सिखाने के लिए । वहां उन्होने किनारे में पड़ी एक खाट बिछाई और मुझे अपनी गोदी में बिठा कर गुदगुदी करने लगे Iमैं अपनी मासूमियत भरी उस मुस्कराहट के साथ उन्हे मना करता रहा "भैया गुदगुदी मत करो , मत करो ना " और वो मुझे पुचकारते हुए और गुदगुदी करते रहे । शायद वो आखरी बार ही था की मैं गुदगुदी पे खुल के मुस्कुराया हूँगा। बाद में उनके खेल ने गुदगुदी पे हसने का अधिकार ही मुझसे छीन लिया। धीरे धीरे वो मेरे को अपने साथ लेकर लेट गए और मुझे निर्वस्त्र कर के मेरे साथ वो किया की उनके हाथो ने नजाने कितनी कोशिश की मुझे हसाने की पर मैं हर बार रोते हुए ये ही कहता रहा "भैया दर्द हो रहा है , मम्मी के पास जाना है" ।वो मजबूत हाथो से मेरे आसूं पूछते और मेरे होठो को चूमते हुए कहते "कुछ नहीं हुआ बाबू, गुदगुदी ही तो कर रहा हुँ, देखो गुदगुदी हो रही है ना, गुदगुदी" मैं सेहमता हुआ कहता "हाँ " क्युंकि ना तो उनकी आँखों में मुझे अपना भाई दीखता था और न ही इस बार गुदगुदी हाथो से की जा रही थी। वो खेल उन्होने मेरे साथ बस उस दिन ही नहीं बल्कि कई बार खेला था और बहुत बार तो मुँह में हाथ रख के खेला । बहुत बार सोचा भी था की माँ को बता दू पर डर था , की जो इंसान छिपकली जैसी खतरनाक जीव को खा सकता है अगर वो मुझे खा गया तो, या मेरे को छिपकलियों के साथ कमरे में बंद कर दिया तो मैं तो मर ही जाऊंगा।

    तो मैं चुप रहा ।

जब अकल आई की छिपकली को खाना एक पैतरा था , तो खुद के अंदर ही इतनी दुविधा हो गई थी की कभी ये बताने की हिम्मत ही नहीं हुई । उन छुटियों के बाद से मैं कभी भी वहाँ नहीं गया और नाहीं किसी को कभी गुदगुदी करने दी। घरवालो ने खूब जानने की कोशिश की उनके खुशनुमा बच्चे को गुदगुदी से कबसे बैर हो गया , पर मैने कभी भी कुछ नहीं बोला । आज भी वो छिपकली मेरे मन में कही रेंगती है , और मुझे याद दिलाती है हर एक वो चीज़ जो मेरे साथ उन छुटियों में हुई थी ।

CSA

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मेरे जीवन में गुदगुदी की परिभाषा ही बदल गई है -

जिस्म को सिकोड़ती हुई,

रूह को झंझोरती हुई,

सांसो को निचोड़ती हुई ,

                                गुदगुदी ।



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